7.8% की छलांग: क्या बदला, क्यों मायने रखता है
पहली तिमाही (अप्रैल–जून 2025) में भारत की GDP 7.8% बढ़ी—अनुमानों से ऊपर और पिछली पांच तिमाहियों में सबसे तेज. बीते साल इसी तिमाही में यह 6.5% थी. नाममात्र आधार पर वृद्धि 8.8% रही, जो मांग के फैलाव और कीमतों के संयम का मिश्रित असर दिखाती है. जनवरी–मार्च 2025 के 7.4% से यह एक स्पष्ट अपसाइड ब्रेक है.
यह उछाल केवल एक-दो जेबों तक सीमित नहीं दिखा. सप्लाई साइड पर विनिर्माण, निर्माण और सेवाओं, तीनों ने ठोस दमखम दिखाया. डिमांड साइड पर निजी खपत और निवेश, दोनों ने साथ दिया. नीतिगत मोर्चे पर रिज़र्व बैंक और केंद्र की पूंजीगत खर्च नीति ने आधार तैयार किया. वित्त मंत्रालय के सूत्रों ने इसे “विस्तृत और संतुलित विस्तार” कहा—यानी वृद्धि किसी एक सेक्टर पर टिकी नहीं है.
राजनीतिक गलियारे में भी असर दिखा. वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इसे संशय और नकारात्मकता के खिलाफ ठोस जवाब बताया और कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर निशाना साधा. सरकार का तर्क है कि हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर पहले से मजबूत रुझान दिखा रहे थे, इसलिए सरप्राइज पॉजिटिव की संभावना थी. बाज़ार अनुमान 6.5% पर अटके थे, असल आंकड़ा उससे काफी ऊपर निकल गया.
वैश्विक तराजू पर रखकर देखें तो तस्वीर और साफ है. इसी अवधि में चीन की वृद्धि 5.2% रही. बाहरी अनिश्चितताओं—ट्रेड तनाव, कमज़ोर वैश्विक मांग—के बावजूद भारत सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा. यही वजह है कि निवेशकों की नज़र अब फुल-ईयर पाथ पर है: क्या यह स्प्रिंट टिकाऊ रन में बदलेगा?
रिज़र्व बैंक ने पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 6.5% का वास्तविक वृद्धि अनुमान दिया था, और Q1 के लिए भी 6.5%. असल प्रदर्शन उससे ऊपर गया. पहले से संकेत मिले थे—अनुकूल मानसून का अनुमान, महंगाई में नरमी, कैपेसिटी यूटिलाइजेशन में बहाव, और वित्तीय शर्तों में सहजता. आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इसी कॉकटेल को घरेलू गतिविधि का समर्थन बताया था.
नाममात्र 8.8% की रफ्तार और वास्तविक 7.8% के बीच का अंतर बताता है कि कीमतों का दबाव नियंत्रण में है. इसका फायदा यह है कि आय का हिसाब बेहतर दिखता है और मांग को सहारा मिलता है. कंपनियों की टॉपलाइन और सरकार के टैक्स कलेक्शन, दोनों के लिए यह सेटअप मददगार हो सकता है.
सेक्टर्स की बात करें तो तस्वीर चौड़ी है:
- विनिर्माण: 7.7% की वृद्धि. लागत स्थिर, मांग स्थिर, और उत्पादन बढ़ा.
- निर्माण: 7.6% की रफ्तार. सरकारी कैपेक्स, रियल एस्टेट और अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर ने साथ दिया.
- सेवाएं: 9.3%—सबसे तेज. कंसल्टिंग, आईटी-सक्षम सेवाएं, फाइनेंस, हॉस्पिटैलिटी, ट्रांसपोर्ट—कई पहिए एक साथ चले.
- कृषि: 3.7%—पिछले साल के 1.5% से स्पष्ट रिकवरी, जब अनियमित मानसून ने झटका दिया था.
सेवा क्षेत्र की तेज़ चाल का असर शहरों के रोज़गार, यात्रा-पर्यटन, और संपर्क आधारित व्यवसायों में दिखा. विनिर्माण में उतार-चढ़ाव कम रहे, जो नई क्षमता जोड़ने और सप्लाई चेन स्थिर होने का संकेत है. निर्माण में सार्वजनिक परियोजनाएं—हाईवे, रेल, पोर्ट, एयरपोर्ट—एंकर की भूमिका में रहीं.
कृषि की रिकवरी सिर्फ आउटपुट की कहानी नहीं है, यह ग्रामीण मांग की रीढ़ भी है. जब खेत की आमदनी संभलती है, तो फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स, टू-व्हीलर, किफायती स्मार्टफोन जैसे सेगमेंट में खरीदारी लौटती है. यही स्पिलओवर व्यापक मांग को स्थिर करता है.
डिमांड साइड के मैट्रिक्स भी मजबूत रहे. प्राइवेट फाइनल कंसम्प्शन एक्सपेंडिचर (PFCE) 7% बढ़ा और उसका हिस्सा 60.3% तक पहुंचा—पहली तिमाही के हिसाब से 15 साल का उच्चतम. यह बताता है कि उपभोक्ता खर्च रफ्तार पकड़ रहा है. सकल स्थिर पूंजी निर्माण (GFCF) 7.8% बढ़ा—निवेश का इंजन चालू है. सरकारी अंतिम उपभोग व्यय नाममात्र 9.7% बढ़ा, जो पिछले साल के 4% से दोगुने से ज्यादा है.
सरकारी पूंजीगत खर्च की लय बनी रही. इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लगातार निवेश ने GFCF को सहारा दिया. सड़क, रेल, बंदरगाह, और हवाईअड्डों पर खर्च का मल्टीप्लायर इफेक्ट निर्माण, सीमेंट, स्टील, मशीनरी और लॉजिस्टिक्स में फैलता है. निजी क्षेत्र के लिए यह सिग्नल है कि मांग टिकाऊ है—यही संकेत आगे जाकर नई क्षमता पर निर्णय चालित करते हैं.
एक अहम मोड़ यह है कि निजी खपत का उभार अब केवल प्रीमियम शहरी उपभोक्ता पर नहीं टिका दिखता. रूरल-सेमी-अरबन जेबों में भी गतिविधि बढ़ रही है—कृषि की रिकवरी और सरकारी ट्रांसफर्स की वजह से. अगर खाद्य मुद्रास्फीति संयमित रही और मानसून सामान्य रहा तो यह बहाव जारी रह सकता है.
सवाल उठता है: क्या यह रफ्तार बाहरी झटकों के बावजूद टिक पाएगी? 27 अगस्त 2025 से अमेरिका ने भारतीय सामान पर 50% टैरिफ लगा दिया—राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे रूस के साथ भारत के रक्षा और तेल लेन-देन से जोड़ा. एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड विनिर्माण और कुछ सेवाओं के लिए यह बाधा है. हालांकि घरेलू मांग का पैमाना फिलहाल कुशन देता है. फिर भी, कुछ सप्लाई चेन और फर्म-लेवल मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है.
टैरिफ का शॉर्ट-टर्म असर कंपनियों के प्राइसिंग और प्रोडक्ट-मिक्स में दिखेगा. वैल्यू-एडेड सेगमेंट्स जहां प्रतिस्पर्धी बढ़त है, वे झटका बेहतर झेल सकते हैं. लो-मार्जिन कमोडिटी लाइनें अधिक प्रभावित होंगी. वैकल्पिक बाजार और री-रूटिंग सीमित राहत देंगे—लेकिन रणनीति बनानी होगी.
एक और जोखिम ऊर्जा कीमतें हैं. कच्चे तेल में उछाल आयात बिल बढ़ाता है और चालू खाते पर दबाव डालता है. घरेलू ईंधन कीमतें अगर ऊपर जाती हैं तो परिवहन लागत और लॉजिस्टिक्स चैन पर असर दिखता है. अभी तक कीमतें व्यापक रूप से अनुकूल रही हैं, पर यह वेरिएबल सतर्क रखता है.
मुद्रास्फीति का ट्रैक यहां निर्णायक होगा. मुख्य महंगाई नरम है, पर खाद्य में तेज़ चढ़ाव नीति के लिए मुश्किल पैदा करता है. अगर खाद्य कीमतें घटती-बढ़ती रहीं तो खपत का उत्साह ठंडा पड़ सकता है. इसके उलट, स्थिर कीमतों का माहौल उपभोक्ता भरोसा और डिस्क्रेशनरी खरीद को टिकाए रखेगा.
ब्याज दरें फिलहाल स्थिर हैं और फाइनेंशियल कंडीशंस सपोर्टिव हैं. बैंक क्रेडिट ग्रोथ मजबूत रही है, खासकर सेवाओं, रिटेल और इंफ्रा-लिंक्ड पोर्टफोलियोज़ में. कैपेसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ने का संकेत मिला है—जब फैक्ट्रियां 75–80% के आसपास चलती हैं, तो नई कैपेक्स पर बोर्डरूम में चर्चा तेज होती है. Q1 के आंकड़े उसी बहस को बल देंगे.
औद्योगिक कंपनियों की कमाई में भी पिछले कुछ तिमाहियों से लागत स्थिरता और प्रोडक्ट-मिक्स सुधार दिख रहा था. Q1 के आउटपुट डेटा उस ट्रेंड का मैक्रो-लेवल वर्ज़न लगते हैं. अगर मार्जिन स्थिर रहे और वॉल्यूम बढ़े तो रोजगार सृजन में सेवाओं के साथ विनिर्माण का योगदान बढ़ सकता है.
रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन की चेन—सीमेंट, स्टील, केबल्स, पेंट्स, होम इम्प्रूवमेंट—ने पिछले साल से बेहतर मांग देखी है. हाउसिंग में मध्यम-सेगमेंट की बिक्री स्वस्थ रही. अगर दरें स्थिर रहीं और आय में सुधार जारी रहा तो निर्माण की 7.6% रफ्तार टिक सकती है.
सेवाओं में 9.3% की छलांग कई धागों से बुनी है—फाइनेंशियल सर्विसेज, डिजिटल पेमेंट्स, ट्रैवल-हॉस्पिटैलिटी, हेल्थकेयर, ऑर्गनाइज्ड रिटेल, और आईटी-सक्षम सेवाएं. घरेलू यात्रा और आयोजन-आधारित अर्थव्यवस्था में खर्च लौटा है. कॉर्पोरेट ट्रैवल और एमआईसीई सेगमेंट के सामान्य होने से एयर ट्रैफिक और होटल ओक्यूपेंसी को सहारा मिला.
कृषि का 3.7% का उछाल मौसम और कीमतों के संतुलन का परिणाम है. फसल पैटर्न में बदलाव, बेहतर भंडारण और सप्लाई मैनेजमेंट से नुकसान घटा. चुनौती यह है कि आपका मॉनसून अगर अगले क्वार्टर में विचलित हुआ तो यह सपोर्ट कमजोर पड़ सकता है. इसलिए, खरीफ के नतीजे और जलाशयों के लेवल पर नजर जरूरी है.
सरकार का कैपेक्स थ्रस्ट इस साल भी केंद्रीय धुरी बना हुआ है. राज्य सरकारों के पूंजीगत व्यय का ऑन-ग्राउंड कन्वर्ज़न बेहतर हुआ तो मल्टीप्लायर और बढ़ेगा. साथ ही, निजी कैपेक्स पाइपलाइन—डेटा सेंटर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, एनर्जी ट्रांजिशन, केमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स—में जो प्रतिबद्धताएं दिख रही हैं, वे अगले 6–8 तिमाहियों में आउटपुट बढ़ा सकती हैं.
एक्सपोर्ट्स पर दबाव नया नहीं है, पर नए टैरिफ ने अनिश्चितता बढ़ाई है. टेक्सटाइल, जेम्स-एंड-ज्वेलरी, इंजीनियरिंग गुड्स, और कुछ फार्मा सब-सेगमेंट्स को कीमत-आधारित प्रतिस्पर्धा में चोट लग सकती है. जहां ब्रांड, टेक्नोलॉजी या रेगुलेटरी एप्रूवल का बफर है, वहां प्रभाव सीमित रहेगा. सेवाओं के निर्यात में भी प्राइसिंग रीसेट दिख सकता है.
फिस्कल मैनेजमेंट की कड़ी परीक्षा भी इसी साल है. कैपेक्स की गति बनाए रखते हुए घाटा-लक्ष्य पर टिके रहना—यही संतुलन वृद्धि की गुणवत्ता तय करेगा. नाममात्र 8.8% की बदौलत कर-संग्रह में मदद की उम्मीद है. अगर विनिवेश, स्पेक्ट्रम और गैर-कर राजस्व ने साथ दिया तो वित्तीय स्पेस बेहतर दिखेगा.
शहर बनाम गांव का फासला घटाना भी मुश्किल काम है. शहरी डिस्क्रेशनरी में तेजी है—कार, एसी, प्रीमियम स्मार्टफोन—पर मास मार्केट श्रेणियों की असल परीक्षा त्योहार सीजन में होगी. Q2 और Q3 में त्योहारी मांग के संकेत बताएंगे कि 60.3% वाला उपभोग-हिस्सा टिकाऊ है या नहीं.
रोजगार की क्वालिटी और हिस्सेदारी पर भी नज़र रहे. सर्विस-ड्रिवन ग्रोथ तेज नौकरियां पैदा कर सकती है, पर स्थायित्व विनिर्माण से आता है. अगर सप्लाई-साइड सुधार—लॉजिस्टिक्स, कंप्लायंस, स्किल—जारी रहे तो 7.7% वाले विनिर्माण की रफ्तार और ऊपर जा सकती है.
नीतिगत मोर्चे पर संदेश साफ है: मोनेटरी, रेगुलेटरी और फिस्कल—तीनों पहियों की समन्वयित चाल ने Q1 को आशा से बेहतर बनाया. आगे रास्ता बाहरी झटकों, मौसम, और कीमतों की स्थिरता पर टिका है. पर शुरुआती रीडिंग बताती है कि घरेलू इंजन—उपभोग और निवेश—दोनों जिंदा हैं.
क्वार्टर-दर-क्वार्टर क्या देखना होगा?
- त्योहारी मांग: शहरी और ग्रामीण, दोनों में टिकाऊ उछाल?
- मुद्रास्फीति: खाद्य कीमतों में अस्थिरता घट रही है या बढ़ रही?
- आरबीआई रुख: दरों और लिक्विडिटी पर संकेत, क्रेडिट की कीमत पर असर.
- कैपेक्स कन्वर्ज़न: बोली, अवॉर्ड और फिजिकल प्रोग्रेस के नए डेटा.
- बाहरी मोर्चा: अमेरिकी टैरिफ का वास्तविक असर, वैकल्पिक बाजारों की प्रगति.
Q1 का पाठ यह है कि जब मैक्रो आधार मजबूत हो और नीतिगत दिशा साफ, तो बाहरी शोर के बीच भी वृद्धि पैदा की जा सकती है. पांच तिमाहियों की सबसे तेज रफ्तार बताती है—सिस्टम में मोमेंटम है. अब नज़र इस पर रहेगी कि साल के बाकी हिस्से में यही व्यापकता बनी रहे.
आगे की राह: टिकाऊपन, जोखिम और मौके
टिकाऊ वृद्धि के लिए तीन शर्तें अहम हैं—कीमतों की स्थिरता, निवेश की निरंतरता, और निर्यात की बहाली. कीमतों में उछाल मांग का उत्साह तोड़ देता है. निवेश की लय टूटे तो खपत बढ़ने पर भी उत्पादन सीमित हो जाता है. और निर्यात नरम रहे तो औद्योगिक चक्र आधा-अधूरा चलता है.
कीमतों पर सतर्कता की वजह साफ है. सप्लाई शॉक्स—खाद्य तेल, दालें, सब्जियां—जब-तब उभरते हैं. बेहतर बफर स्टॉक्स, समय पर आयात-निर्यात नीति और राज्य-स्तर पर ऑफ-टेक मैनेजमेंट से असर को सीमित किया जा सकता है. अभी का संकेत यह है कि व्यापक मुद्रास्फीति काबू में है, जो उपभोक्ता मनोविज्ञान के लिए सकारात्मक है.
निवेश की निरंतरता सरकारी-निजी साझेदारी पर टिकी है. निजी क्षेत्र की बैलेंस शीट सुधार चुकी हैं, एनपीए चक्र नीचे है, और लागत पूंजी पर स्पष्टता है. अगर डिमांड विजिबिलिटी बनी रही तो बोर्डरूम में “कब” की जगह “कहां” और “कितना” जैसे सवाल बढ़ेंगे. डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन एनर्जी, सेमीकंडक्टर-लिंक्ड वैल्यू चेन—यही नई कैपिटल फॉर्मेशन के हॉटस्पॉट हैं.
निर्यात की बहाली में मार्केट डायवर्सिफिकेशन, एफटीए-प्रोग्रेस और लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम निर्णायक होंगे. घरेलू पोर्ट-रेल कनेक्टिविटी में सुधार के बावजूद ट्रांसशिपमेंट और कस्टम्स टाइमिंग्स पर और काम ज़रूरी है. जहां अनुपालन सरल और पूर्वानुमेय होता है, वहां निवेश और निर्यात दोनों तेज होते हैं.
रोजगार और स्किलिंग का धागा इस पूरी कहानी को जोड़ता है. सर्विस सेक्टर की 9.3% की स्पीड अगर स्किल-डेफिसिट से टकराई तो अवसर अधूरे रहेंगे. आईटी-सक्षम सेवाओं से लेकर हेल्थकेयर, टूरिज्म और लॉजिस्टिक्स तक—कौशल विकास और माइक्रो-क्रेडेंशियल्स पर फोकस से उत्पादकता बढ़ेगी.
वित्तीय स्थिरता की बात करें तो बैंकों की पूंजी स्थिति आरामदायक है और क्रेडिट कॉस्ट दबाव में नहीं हैं. कैपिटल मार्केट्स ने इक्विटी और डेट दोनों में जुटान में मदद की है. अगर वैश्विक बॉन्ड इंडेक्स इन्क्लूजन और एफपीआई फ्लोज़ अनुकूल रहे तो उधारी की कीमत और स्प्रेड्स सहूलियत देंगे.
राजकोषीय मोर्चे पर गुणवत्ता वाली खर्च प्राथमिकता—कैपेक्स, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्किल—लंबी दूरी की ग्रोथ बनाती है. रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में दक्षता और लीकेज कंट्रोल से फिस्कल स्पेस पैदा होता है. Q1 के बेहतर वृद्धि आंकड़े टैक्स-रसीदों को सपोर्ट देंगे, जिससे पब्लिक इंवेस्टमेंट की गति पकड़ में रहेगी.
और अंत में, कॉरपोरेट बोर्डरूम के लिए सिग्नल साफ है: मांग मौजूद है, नीतिगत दिशा सहयोगी है, और मैक्रो रिद्म अनुकूल है. चुनौती यह है कि बाहरी झटकों और इनपुट वोलैटिलिटी के बीच मार्जिन की सेहत बनाए रखते हुए स्केल-अप किया जाए. जो कंपनियां सप्लाई-चेन विविधीकरण, डिजिटाइजेशन और प्रोडक्ट-इनोवेशन पर निवेश बढ़ा रही हैं, वे इस चक्र में आगे रहेंगी.
Q1 FY26 एक हाई-बेस पर हाई-बीट कहानी है. अब नज़र Q2–Q4 पर—त्योहारी खपत, निवेश का कन्वर्ज़न, और वैश्विक हवा का रुख. फिलहाल इतना तय है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने साल की शुरुआत तेज कदमों से की है, और ट्रैक पर दम भी दिखा है.
Anshul Jha
अगस्त 30, 2025 AT 18:52विदेशी एजेंटों की साजिश है कि वे भारत की तेज़ी को रोके और हमारी आर्थिक जीत को ठप्प करवाए
Anurag Sadhya
सितंबर 5, 2025 AT 13:46ऐसे विचारों से माहौल खट्टा होता है 🙏 लेकिन आँकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि घरेलू मांग और निवेश दोनों ही मजबूत हैं 🚀
Sreeramana Aithal
सितंबर 11, 2025 AT 08:39इसी चमक‑धमक वाले आँकड़ों के पीछे लुके हुए तथ्यों को उजागर करना हमारा कर्तव्य है 🧐 आर्थिक नीतियों का सही दिशा‑निर्देश न होना ही भ्रष्टाचार की बड़ाई करता है, और यही असहमति का मूल कारण है
Anshul Singhal
सितंबर 17, 2025 AT 03:32भारत की इस Q1 वृद्धि को सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि एक नयी आशा की धारा मानना चाहिए।
जब नीतिगत ढचा स्थिर हो और बॉन्ड बाजार में आत्मविश्वास की भावना बनी रहे, तो निवेशकों का भरोसा भी बढ़ता है।
सेवा क्षेत्र की 9.3% रफ्तार यह दर्शाती है कि उपभोक्ता मनोविज्ञान में विश्वास का स्तर ऊँचा है।
विनिर्माण में 7.7% की बढ़ोतरी संकेत देती है कि कारखानों में उत्पादन क्षमता का उपयोग बेहतर हो रहा है।
निर्माण क्षेत्र का 7.6% विकास अंतर्निहित इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की निरंतरता को सुदृढ़ करता है।
कृषि में 3.7% की उछाल यह दिखाता है कि मानसून की अनुकूलता और सरकारी समर्थन ने फसल उत्पादन को स्थिर किया है।
डिमांड‑साइड के मैट्रिक्स, जैसे PFCE का 7% बढ़ना, यह बताता है कि निजी खर्च अभी भी जीवंत है।
कैपेक्स में निरंतर वृद्धि का मतलब है कि राज्य और केंद्र की योजना‑बद्ध पूंजीगत व्यय वास्तविक रूप में परिवर्तित हो रही है।
विदेशी टैरिफ का प्रभाव एक विलंबित शॉक है, परन्तु घरेलू बाजार की दृढ़ता इसको कमज़ोर करने में सक्षम हो सकती है।
मौसम और ऊर्जा कीमतों में उतार‑चढ़ाव जोखिम बना रहता है, फिर भी वर्तमान में कीमतों का उच्च नियंत्रण एक सकारात्मक संकेत है।
ब्याज दरों का स्थिर रहना वित्तीय शर्तों को आसान बनाता है और क्रेडिट साइड को समर्थन देता है।
यदि इस गति को Q2‑Q4 में भी बनाए रखा गया, तो भारत की वार्षिक 8% लक्ष्य आसानी से हासिल हो सकता है।
यह क्रमिक विकास न केवल आर्थिक आंकड़ों को बल देता है, बल्कि सामाजिक उत्थान की दिशा में भी कदम बढ़ाता है।
अंत में, हमें इस उत्साह को सतत बनाने के लिये नीति‑निर्माताओं, उद्योगपतियों और आम नागरिकों को मिलकर कार्य करना होगा।
संकल्पित प्रयास ही इस आर्थिक रिवाज का स्थायी रूप से पोषण करेंगे।
DEBAJIT ADHIKARY
सितंबर 22, 2025 AT 22:26उल्लेखित आँकड़े वाकई प्रशंसनीय हैं तथा इनके निरंतरता के लिये नियोजित नीतियों की पुनः समीक्षा अनिवार्य प्रतीत होती है।
abhay sharma
सितंबर 28, 2025 AT 17:19बहुतेर परफेक्ट वृद्धि है क्या
Abhishek Sachdeva
अक्तूबर 4, 2025 AT 12:12अगर हम सतही प्रशंसा में फँस जाएँ तो वास्तविक समस्याएँ हमारी आँखों से ओझल हो जाएँगी ; मुद्रास्फीति में अभी भी खाद्य मूल्य की अस्थिरता है और विदेशी टैरिफ का दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं हुआ है ; इसलिए सतत विकास के लिये नीति समायोजन की आवश्यकता है।
Janki Mistry
अक्तूबर 10, 2025 AT 07:06GDP YoY 7.8% संकेत करता है कि real output acceleration, capacity utilization 78% और monetary stance accommodative है
Akshay Vats
अक्तूबर 16, 2025 AT 01:59इंकी आर्थिक तिज़ी में हरकोई धोक दे रहा है क्योकि लोग लाब के लिये इन्साफ़ को नजरअंदाज करते हैं
Anusree Nair
अक्तूबर 21, 2025 AT 20:52आइए मिलकर इस गतिशीलता को आगे बढ़ाएं, हर एक निवेशक और नागरिक इस आर्थिक उछाल में अपना योगदान दे, तभी हमारा भविष्य और उज्ज्वल होगा 🌟